मंथन

सत्य के पीछे का सच

Archive for June, 2017

Samay samay ki baat hai..

Posted by Sudeep Pandey on June 2, 2017

हम लोग कमाल के समय में जी रहे हैं.
बचपन में माताजी एक कथा सुनाती थीं: कोई अगर आप से कहे कि कौवा आपकी नाक ले कर उड़ गया, तो पहले अपनी नाक देखनी चाहिए, ना कि कौवे के पीछे भागना शुरू कर दें.. भैया आपकी नाक अपनी जगह पे ही लगी है.

आज के समय में, हम अपने पूर्वाग्रह से इतने ज़्यादा ग्रसित हैं कि हम सिर्फ़ कौवे को पत्थर मारना चाहते हैं. भले वो मेरी नाक ले कर उड़ा है या किसी और की, या फिर वो बेचारा सिर्फ़ घड़े का पानी पीने के लिए पत्थर जुटा रहा है, हमें कोई फ़र्क नहीँ पड़ता. और तो और, यह कौवे और इस एक आदमी की लड़ाई राष्ट्रीय आपदा बन जाती है, तथा ३० ओबी वेन, ४० कैमेरे, और ५० रिपोर्टेर आपको लाइव टेली कास्ट भी दिखाएँगे. फिर, तुलसी बाबा के शब्दों में “जाकी रही भावना जैसी, हरि मूरत तिन देखी तैसी”, संपूर्ण राष्ट्र दो धड़ों मे बँट जाएगा. आधी दुनिया कौवे को बुरा बताएगी बाकी आधी उस आदमी को. और साहब, एक बार हमने राय कायम कर ली, तो कर ली!! अब तो जंग है… पूरे लाव लश्कर के साथ जुट जाएँगे फ़ेसबुक और ट्विटर पे, यह साबित करने को, कि हम कैसे सही हैं. शायद उस से भी ज़्यादा ज़रूरी यह साबित करना होता है कि तुम कैसे ग़लत हो. कैसे कैसे अनर्गल प्रलाप!!

सूचना संचार क्रांति के इस दौर में, जब कि यह अपेक्षित था कि तमाम जानकारियाँ सहज सुलभ उपलब्ध हों, और एक आम इंसान एक सूचित राय कायम कर सके, हम अपने पशुवत प्रवृत्तियों से बाहर नहीं आ पा रहे हैं, यह बहुत अफ़सोस की बात है. दुष्यंत कुमार की पंक्तियाँ याद आती हैं:

कहाँ तो तय था चिरागा हर एक घर के लिए,
यहाँ चिराग मयस्सर नहीं शहर के लिए.

शायद दिनकर जी ने यह कुरुक्षेत्र पहले ही देख लिया था जब उन्होने लिखा था:

सावधान मनुष्य यदि विज्ञान है तलवार .
तो उसे दे छोड़, तजकर मोह स्मृति के पार |
हो चुका है सिद्ध कि तू है शिशु अभी नादान,
फूल काँटों की तुझे कुछ भी नहीं पहचान,
खेल सकता तू नहीं ले हाथ में तलवार ;
काट लेगा अंग तीखी है बड़ी यह धार ||

तो लब्बोलुआब यह है कि ये फ़ेसबुक ट्विटर आदि दोधारी तलवार हैं. आप इनका प्रयोग करके राष्ट्र निर्माण भी कर सकते हैं, और अनर्गल प्रलाप के लिए भी. या फिर आप मेरे जैसे समाधिस्थ भी रह सकते हैं. समाधि का अर्थ है: सम+ आधि. अर्थात आप संतुलन बना कर रख सकते हैं, दोनो तरफ के तर्क सुन सकते हैं, उन पर विचार कर सकते हैं, एक सूचित राय कायम कर सकते हैं, लेकिन किसी की राय बदलना आपके(वो भी बल पूर्वक) कार्यक्रम का हिस्सा नही होना चाहिए.

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