मंथन

सत्य के पीछे का सच

राम प्रसाद बिस्मिल कृत

हैफ़ हम जिसपे कि तैयार थे मर जाने को
जीते जी हमने छुडाया उसी कशाने को
क्या था और बहाना कोई तडपाने को
आस्मां क्या यही बाक़ी था सितम ढाने को
लाके ग़ुरबत में जो रक्खा हमें तरसाने को

फिर गुलशन में हमें लाएगा सैयाद कभी
याद आएगा किसे यह दिलनाशाद कभी
क्यों सुनेगा तू हमारी को फ़रियाद कभी
हम भी इस बाग़ में थे क़ैद से आज़ाद कभी
अब तो काहे को मिलेगी ये हवा खाने को

दिल फ़िदा करते हैं क़ुरबान जिगर करते हैं
पास जो कुछ है वो माता की नज़र करते हैं
खाना वीरान कहां देखिए घर करते हैं
ख़ुश रहो अहलवतन, हम तो सफ़र करते हैं
जाके आबाद करेंगे किसी वीराने को

मयस्सर हुआ राहत से कभी मेल हमें
जान पर खेल के भाया कोई खेल हमें
एक दिन का भी मंज़ूर हुआ बेल हमें
याद आएगा अलीपुर का बहुत जेल हमें
लोग तो भूल गये होंगे उस अफ़साने को

अंडमान ख़ाक तेरी क्यों हो दिल में नाज़ा
छूके चरणों को जो पिंगले के हुई है जीशां
मरतबा इतना बढ़े तेरी भी तक़दीर कहां
आते आते जो रहेबॉल तिलकभी मेहमां
मांडलेको ही यह एज़ाज़ मिला पाने को

बात तो जब है कि इस बात की ज़िदे ठानें
देश के वास्ते क़ुरबान करें हम जानें
लाख समझाए कोई, उसकी हरगिज़ मानें
बहते हुए ख़ून में अपना गरेबां सानें
नासेह, आग लगे इस तेरे समझाने को

अपनी क़िस्मत में अज़ल से ही सितम रक्खा था
रंज रक्खा था, मेहन रक्खा था, ग़म रक्खा था
किसको परवाह थी और किसमे ये दम रक्खा था
हमने जब वादीग़ुरबत में क़दम रक्खा था
दूर तक यादवतन आई थी समझाने को

हम भी आराम उठा सकते थे घर पर रह कर
हम भी मां बाप के पाले थे, बड़े दुःख सह कर
वक़्तरुख्ह्सत उन्हें इतना भी आए कह कर
गोद में आंसू जो टपके कभी रूख़ से बह कर
तिफ्ल उनको ही समझ लेना जी बहलाने को

देशसेवा का ही बहता है लहू नसनस में
हम तो खा बैठे हैं चित्तौड के गढ की क़समें
सरफरोशी की अदा होती हैं यों ही रसमें
भालखंजर से गले मिलते हैं सब आपस में
बहनो, तैयार चिताओं में हो जल जाने को

अब तो हम डाल चुके अपने गले में झोली
एक होती है फक़ीरों की हमेशा बोली
ख़ून में फाग रचाएगी हमारी टोली
जब से बंगाल में खेले हैं कन्हैया होली
कोई उस दिन से नहीं पूछता बरसाने को

अपना कुछ ग़म नहीं पर हमको ख़याल आता है
मादरहिंद पर कब तक जवाल आता है
हरादयालआता हैयरोपसे लालआता है
देश के हाल पे रह रह के मलाल आता है
मुन्तजिर रहते हैं हम ख़ाक में मिल जाने को

नौजवानों, जो तबीयत में तुम्हारी ख़टके
याद कर लेना हमें भी कभी भूलेभटके
आप के जुज़वे बदन होवे जुदा कटकट के
और सद चाक हो माता का कलेजा फटके
पर माथे पे शिकन आए क़सम खाने को

देखें कब तक ये असिरानमुसीबत छूटें
मादरहिंद के कब भाग खुलें या फूटें
गाँधी अफ़्रीका की बाज़ारों में सडकें कूटें
और हम चैन से दिन रात बहारें लूटें
क्यों तरजीह दें इस जीने पे मर जाने को

कोई माता की उम्मीदों पे डाले पानी
ज़िंदगी भर को हमें भेज के काले पानी
मुंह में जल्लाद हुए जाते हैं छाले पानी
आबखंजर का पिला करके दुआ ले पानी
भरने क्यों जायें कहीं उम्र के पैमाने को

मैक़दा किसका है ये जामसुबू किसका है
वार किसका है जवानों ये गुलू किसका है
जो बहे क़ौम के खातिर वो लहू किसका है
आस्मां सॉफ बता दे तू अदू किसका है
क्यों नये रंग बदलता है तू तड्पाने को

दर्दमन्दों से मुसीबत की हलावत पूछो
मरने वालों से ज़रा लुत्फ़शहादत पूछो
चश्मगुस्ताख से कुछ दीद की हसरत पूछो
कुश्तनाज़ से ठोकर की क़यामत पूछो
सोज़ कहते हैं किसे पूछ लो परवाने को

नौजवानों यही मौक़ा है उठो खुल खेलो
और सर पर जो बला आए ख़ुशी से झेलो
क़ौम के नाम पे सदक़े पे जवानी दे दो
फिर मिलेंगी ये माता की दुआएं ले लो
देखें कौन आता है इरशाद बजा लाने को

4 Responses to “राम प्रसाद बिस्मिल कृत”

  1. Nice collections…Need more from your side.

  2. yunus said

    जब इस रचना को विकलता से ढूंढ रहा था तो यहां इसे पाया । शुक्रिया आपका ।

    • Sudeep Pandey said

      @Yunus: I tried to compile few of my favorites, which are not readily available either on internet or in market. I hope you will find few more such pieces. Feel free to request any other which you are looking for. I will try and address those requests [:)]

  3. Arun Bhati said

    must read for every indian

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