मंथन

सत्य के पीछे का सच

इसीलिए तो…

इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू,
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नही था.

जिनका दुख लिखने की खातिर
मिली ना इतिहासों को स्याही
क़ानूनों को नाखुश करके
मैने उनकी भरी गवाही
जले उम्र भर फिर भी जिनकी
अर्थी उठी अंधेरे ही में
खुशियों की नौकरी छोड़ कर
मैं उनका बन गया सिपाही

पद-लोभी आलोचक कैसे,
करता दर्द पुरस्कृत मेरा,
मैने जो कुछ गाया उसमे करुणा थी
शृंगार नही था
इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू,
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नही था

मैने चाहा नही कि कोई,
आ कर मेरा दर्द बटाये,
बस यह ख्वाहिश रही कि मेरी
उम्र जमाने को लग जाए.
चमचम चोली-चूनर पर तो
लिखने वाले लाखों ही थे,
मेरी मगर ढिठाई, मैने
फटी कमीज़ों के गुण गाए.

इसका ही यह फल है शायद
कल जब मैं निकला दुनिया में
तिल भर ठौर मुझे देने को
मरघट तक तैयार नही था.

इसीलिए तो नगर-नगर बदनाम हो गये मेरे आँसू,
मैं उनका हो गया कि जिनका कोई पहरेदार नही था

One Response to “इसीलिए तो…”

  1. moti lal sharma (chack) said

    jinke ho pahredar wo log ghotan ki jindgi jiya karte hai,
    hamko nahi pata ki aap log unka pichha kaiya kate hai.

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