मंथन

सत्य के पीछे का सच

मैं और मेरी आवारगी

फिरते हैं कब से दर--दर अब इस नगर अब उस नगर
एक दूसरे के हमसफ़र मैं और मेरी आवारगी
ना आशना हर रहगुज़र ना मेहरबाँ है एक नज़र
जायें तो अब जायें किधर मैं और मेरी आवारगी

हम भी कभी आबाद थे ऐसे कहाँ बर्बाद थे
बेफ़िक्र थे आज़ाद थे मसरूर थे दिलशाद थे
वो चाल ऐसी चल गया हम बुझ गये दिल जल गया
निकले जला के अपना घर मैं और मेरी आवारगी

ये दिल ही था जो सह गया वो बात ऐसी कह गया
कहने को फिर क्या रह गया अश्कों का दरिया बह गया
जब कह कर वो दिलबर गया तेरे लिए मैं मर गया
रोते हैं उस को रात भर मैं और मेरी आवारगी

अब गम उठायें किस लिए ये दिल जलायें किस लिए
आँसु बहायें किस लिए यूँ जाँ गवायें किस लिए
पेशा ना हो जिसका सितम ढूँढेंगे अब ऐसा सनम
होंगे कहीं तो कारगर मैं और मेरी आवारगी

आसार हैं सब खोट के इमकान हैं सब चोट के
घर बंद हैं सब कोट के अब ख़त्म है सब टोटके
क़िस्मत का सब ये खेल है अंधेर ही अंधेर है
ऐसे हुए हैं बेअसर मैं और मेरी आवारगी

 

वो माह--वश वो माह--रूह वो माह--कामिल हू--हू
थीं जिसकी बातें कू--कू उस से अजब थी गुफ्तगू
फिर युँ हुआ वो खो गई और मुझ को ज़िद सी हो गई
लायेंगे उस को ढूँढ कर मैं और मेरी आवारगी

 

जब हमदम--हमराज़ था तब और ही अंदाज़ था
अब सोज़ है तब साज़ था अब शर्म है तब नाज़ था
अब मुझ से हो तो हो भी क्याहै साथ वो तो वो भी क्या
एक बेहुनर एक बेसबर मैं और मेरी आवारगी

One Response to “मैं और मेरी आवारगी”

  1. moti lal sharma (chack) said

    tujhe or teri aawargi ko ulfat ka daur na mila hoga,
    bhatkate rahe tum shayad koi thaur na mila hoga,
    yo shayad tum kalam na uthate ye likhane ko,
    lagta hai shayad mohbbat ka kai chhaur na mila hoga.

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