तब रोक ना पाया मैं आँसू
तब रोक ना पाया मैं आँसू.
जिसके पीछे पागल होकर, दौड़ा मैं अपने जीवन भर,
जब मृगजल में परिवर्तित हो मुझ पर मेरा अरमान हँसा
तब रोक ना पाया मैं आँसू
जिसमें अपने प्राणो को भर, कर देना चाहा अजर अमर,
जब विस्मृति के पीछे छिप कर मुझ पर वह मेरा गान हँसा
तब रोक ना पाया मैं आँसू.
मेरे पूजन-आराधन को, मेरे सम्पूर्ण समर्पण को,
जब मेरी कमज़ोरी कह कर मेरा पूजित पाषाण हँसा
तब रोक ना पाया मैं आँसू.